Monday, 15 May 2017

निम्बार्काचार्य पीठाधीवर श्री परशुराम देवाचार्य

भक्तमाल दास भक्तमाली:
जगद्गुरुश्रीनिम्बार्काचार्य पीठ, श्रीनिम्बार्क-तीर्थ, सलेमाबाद :
श्रीनिम्बार्क-तीर्थ लगभग 500 वर्ष पूर्व भयंकर जंगल था। जिसमें कई तरह के हिंसक जानवर रहते थे। इसी जंगल में एक सुन्दर आश्रम भी था। जिसमें साधु सन्त निवास करते थे। इन सन्तों को एक दुष्ट फकीर मस्तिंगशाह ने यहॉ से भगाकर इस आश्रम पर अपना अधिकार जमा लिया। तथा बाद में यहाँ से होकर गुजरने वाले तीर्थ यात्रियों को तंग करने लगा। उस समय इस मार्ग से काफी तीर्थ यात्री पुष्कर एवं द्वारका जाते थे, क्योंकि इन दोनो धामों को जाने का यह एक मुख्य मार्ग था। एक बार उस दुष्ट फकीर ने इस मार्ग से गुजरने वाले सन्तों के एक दल को अपनी करतूतों से कष्ट पहॅुचाना शुरु कर दिया। यहा से सन्त किसी प्रकार बचकर मथुरा में श्री हरिव्यास देवाचार्य जी महाराज के पास पहुचे तथा वहा पहुचकर उन्होनें अपने साथ घटित घटना के बारे में उन्हें जानकारी दी तथा इस स्थान को दुष्ट फकीर मस्तिंगशाह से मुक्त कराने की प्रार्थना की। महाराज श्री को उस दुष्ट के कृत्यों के बारे में जानकर काफी दु:ख पहुचा। तब उन्होनें अपने प्रिय शिष्य श्री परशुराम देवाचार्य जी को उस फकीर को भगा कर धर्म प्रेमी जनता को निर्भय कर वैष्णव धर्म प्रचार की आज्ञा प्रदान की। तब श्री परशुराम देवाचार्य जी ने गुरु के चरणों की वंदना कर उनकी आज्ञानुसार पुष्कर परिक्षेत्र के श्रीनिम्बार्कतीर्थ में रह रहे दुष्ट फकीर की सिद्धियों को नष्ट कर यहा से भागने पर विवश कर दिया। तथा श्रीनिम्बार्कतीर्थ एवं यहा से गुजरने वाले तीर्थ यात्रियों को भय मुक्त कर दिया। इस फकीर की कब्र आज भी आचार्य पीठ से दक्षिण दिशा में बगीची वाले बालाजी के मन्दिर के पास विद्यमान है।
इसके पचात्‌ श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज ने अपने गुरु श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी की आज्ञा पाकर इस स्थान पर आचार्य पीठ की स्थापना की। इन्ही श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के साथ जुड़ी एक घटना से इस स्थान का नाम श्रीनिम्बार्कतीर्थ के साथ-साथ सलेमाबाद भी रख दिया गया। वो घटना इस कार है :-
बादशाह शेरशाह सूरी के कोई पुत्र नहीं था। अत: बादशाह एक बार पुत्र प्राप्ति की कामना से अजमेर स्थित विश्व सिद्ध ख्वाजा माइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आया हुआ था। परन्तु बादशाह को विभिन्न उपायों के बाद भी पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। इस कारण वह बहुत निराश था। उसकी इसी निराशा को देखते हुये, उसकी ही सेना के सेनापति जोधपुर राज्य के खेजड़ला ग्राम के ठाकुर श्री शियोजी भाटी जो स्वयं श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के शिष्य थे। उन्होंने शेरशाह सूरी से निवेदन किया कि यदि आप एक बार मेरे गुरुश्री के दर्शन करें तो आपको अवश्य ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हो सकती है, ऐसा मेरा विश्वास है। ठाकुर साहब ने बादशाह सलामत को बताया कि आचार्य श्री यहॉ अजमेर से मात्र दस कोस की दूरी पर ही स्थित श्रीनिम्बार्कतीर्थ में निवास करते हुये श्रीसर्वेश्वर प्रभु की आराधना करते हैं। शेरशाह सूरी ने श्री शियोजी के विश्वास एवं पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा के कारण श्रीनिम्बार्कतीर्थ चलने का आमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया, तथा यहाँ आकर आचार्य श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के दर्शन प्राप्त किये। बादशाह शेरशाह सूरी ने आचार्य श्री के चरणों में प्रणाम कर एक स्वर्ण-रत्न जड़ित कीमती दुशाला भेंट किया। आचार्य श्री ने निर्विकार भाव से उस बहुमूल्य दुशाले को अपने चिमटे से उठाकर अपने सामने ज्वलित हवन कुण्ड़ धूनी में डाल दिया। जब बादशाह ने अपने भेंट किये हुये दुशाले को जलता हुआ देखा तो उसके मन में कई प्रकार के विचार उत्पन्न होने लगे। आचार्य श्री ने जब बादशाह के मन के विचाराेें को अपने योग बल से जाना क्योंकि आप श्री तो अन्तर्यामी थे तो आपने उसी चिमटे से हवन कुण्ड़ में से उसी प्रकार के स्वर्ण-रत्न जड़ित विभि प्रकार के दुाशालों का ढ़ेर बादशाह के सामने लगा दिया और बादशाह से कहा इसमे से तेरा जो भी दुशाला हो उसे उठा ले। हमारा तो खजाना यही हवन कुण्ड़ है, जो आता है, हम तो इसी में रख देते है। तू दु:खी मत हो । यह चमत्कारी घटना देखकर शेरशाह सूरी श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के चरणों में गिर पड़ा एवं अपनी गलत भावनाओं के लिये क्षमायाचना करने लगा। तत्पचात्‌ आचार्यश्री ने बादशाह की प्रार्थना पर सर्वेश्वर प्रभु का स्मरण कर पुत्र रत्न प्राप्त होने का आशीर्वाद प्रदान किया। समय आने पर बादशाह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तथा उसका नाम सलीम शाह रखा गया। पुत्र प्राप्ति के बाद बादशाह एक बार पुन: अपने लाव-लश्कर के साथ विभिन्न प्रकार की भेंटे लेकर श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के चरणों में आया। उसने आचार्य श्री के चरणों में बहुत सारे हीरे, जवाहरात एवं स्वर्ण मुद्रायें रख दी। परन्तु महाराज श्री ने उनमें से एक भी वस्तु स्वीकार नही की। तब एक बार फिर बादशाह को अपनी तुच्छता का अहसास हुआ। अन्त में उसने आचार्य
जी के चरणों में अपना सिर रख कर यहा पर एक ग्राम निर्माण की आज्ञा प्रदान करने की प्रार्थना की तथा उस ग्राम का नाम अपने पुत्र सलीम शाह के नाम पर रखने की स्वीकृति चाही। आचार्य श्री ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। तब से इस ग्राम का नाम श्रीनिम्बार्कतीर्थ के साथ-साथ सलेमाबाद भी पड़ गया।
इसके बाद बादशाह ने जाते-जाते इस क्षेत्र की लगभग छ: हजार बीघा जमीन गायों के चरने के लिये आचार्य पीठ को समर्पित कर दी। इसके प्रमाण स्वरूप बादशाह ने ताम्रपत्र प्रदान किया जो आज भी आचार्य पीठ में सुरक्षित है।
विशेष :- राजस्थान में समय-समय पर राजस्थान की देशी रियासतों के अनेक राजाओ ने भी इस सम्प्रदाय के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की। जयपुर नरेश जगत सिंह ने संवत्‌ 1856 में सलेमाबाद आकर आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त किया जिसके फलस्वरुप राजकुमार जयसिंह का जन्म हुआ, अत: इस उन्होंने उन्नीसवीं सदी में इस संप्रदाय को बहुत श्रय दिया और अनेक मेले आयोजित किये इसका उल्लेख इतिहास में मिलता है।
श्रीराधा-माधव मन्दिर :- इस मन्दिर का निर्माण वि0 सं0 1520 के लगभग अनन्त श्री विभूषित जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठाधीवर श्री परशुराम देवाचार्य जी महाराज के निर्देशानुसार जोधपुर राज्य के खेजड़ला ग्राम के सरदार श्री शियोजी भाटी एवं श्री गोपाल सिंह जी भाटी के विशेष सहयोग से हुआ। इस मन्दिर का वर्तमान स्वरूप वि0 सं0 1871 में श्रीनिम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर शरण देवाचार्य जी महाराज के समय में आया। इस मन्दिर में गीत-गोविन्दकार रससिद्ध संस्त कवि श्री जयदेव द्वारा सेवित श्रीराधा-माधव जी की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही यहाँ पर श्री गोकुल चन्द्रमा जी एवं श्री बांकेबिहारी जी के दर्शन है, तथा आचार्य पंचायतन के भी सुन्दर दर्शन है।
राधमाधव दरा यह, सेवित कवि जयदेव।
उत्सव-महोत्सव नित प्रति, ’’शरण’’ प्रभु सेव।।
श्रीसर्वेश्वर प्रभु :- श्रीसनकादि संसेव्य परमाराध्य श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ गुंजाफल सदृा अति सूक्ष्म श्रीशालिग्राम स्वरूप श्रीविग्रह हैं। इसके चारों ओर गोलाकार दक्षिणावर्तचक्र और किरणें बडी ही तेजपूर्ण एवं मनोहर प्रतीत होती हैं। मध्य भाग में एक बिन्दु है और उस बिन्दु के मध्य भाग में युगल सरकार श्रीराघकृष्ण के सूक्ष्म दर्शन स्वरूप दो बडी रेखायें हैं। जो सूर्य के प्रकाश में कभी किसी भाग्यााली सज्जन को ही दिखाई पडती है। यह सर्वेश्वर भगवान्‌ की प्रतिमा श्रीसनकादिकों ने देवर्षि श्रीनारदजी को प्रदान की थी और श्रीनारदजी ने भगवान्‌ श्रीनिम्बार्क को प्रदान की। इस तरह यह श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ की शालिग्राम प्रतिमा क्रमा: परम्परागत अद्यावधि अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, निम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। विश्व में इतनी प्राचीन एवं सूक्ष्म चमत्कारपूर्ण श्रीशालिग्राम मूर्ति और कहीं पर भी नहीं हैं। जब श्रीआचार्यचरण धर्म प्रचार अथवा किन्हीं भक्तजनों के परमाग्रह पर यत्र तत्र पधारते हैं, तब यही श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा साथ रहती है। श्रीसर्वेश्वर भगवान्‌ निम्बार्क सम्प्रदाय के परमोपास्य इष्टदेव है। श्रीनिम्बार्काचार्य में परमनिधि श्रीसर्वेश्वर प्रभु के दर्शन मात्र से समस्त पातक दूर होते हैं। इसी कारण श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के भक्तजनों में परस्पर मिलने पर जय श्रीसर्वेश्वर बोलने की प्रणाली सदा से चली आरही है। यह प्रतिमा अत्यन्त प्राचीन है। जिसके बारे में कई पुराणों एवं उपनिषदो में वर्णन मिलता है। जैसे माण्डूक्योपनिषद के मन्त्र में भगवान्‌ सर्वेश्वर श्रीहरि की महिमा का वर्णन करते हुये लिखा गया है :-
एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:।
योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययौहि भूतानाम्‌।।
अर्थात्‌ :-यह सर्वेश्वर भगवान्‌ सर्वज्ञ है। यह प्राणी मात्र अर्थात्‌ चराचर जगत्‌ में अन्तर्यामी रूप से व्याप्त हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ का यह कारण है। प्राणियों की उत्पा, उनका पालन और समय पूर्ण होने पर उनका संहार भी उन्हीं सर्वेश्वर श्रीहरि के द्वारा होता हैं।
श्रीसर्वेश्वर प्रभु सलेमाबाद में किस प्रकार पधारे, इस बारे में कथा इस प्रकार है- एक बार जब ब्रह्मा जी ने सनकादिक ऋषियों से कहा कि वे भगवान्‌ की पूजा करें तो सनकादिक ऋषियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि वे किस भगवान्‌ की पूजा करें। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सूचित किया कि वे गण्डकी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित दामोदर कुण्ड जो कि वर्तमान में नेपाल में मुनािरायण धाम से आगे स्थित हैं पर जायें, जहा तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु का प्रतिरूप प्राप्त होगा। आप उसी की पूजा करें। इसके पश्चात्‌ सनकादि ऋषि दामोदर कुण्ड गये तो वहा उन्हें तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु के प्रतिरूप श्री शालग्राम प्राप्त हुये। इनका नाम श्री सर्वेश्वर प्रभु रखा गया। तथा इस श्रीविग्रह की श्रीसनकादिको द्वारा पूजा अर्चना की गई।
गौर-यामावभासं तं सूक्ष्मदिव्यमनोहरम्‌।
वन्दे सर्वेश्वरं देवं श्रीसनकादिसेव
मंदिर में होने वाली आरतियों का समय-
आरती ग्रीष्माकालीन शीतकालीन
1 मंगला प्रात: 5-30 बजे प्रात: 6-30 बजे
2 श्रृंगार प्रात: 9-00 बजे प्रात: 9-30 बजे
3 राजभोग दोपहर 12-00 बजे दोपहर 12-30 बजे
4 सन्ध्या सांय 7-00 बजे सांय 6-00 बजे
5 शयन रात्रि 8-30 बजे रात्रि 8-00 बजे
अर्थात्‌ :- गौर और श्याम इन दो बिन्दुओं से सुशोभित, श्यामल विग्रह, सूक्ष्माकार, दिव्य मनोहर उन शालग्राम स्वरूप श्रीसर्वेश्वर प्रभु की मैं वन्दना करता हू। जिनकी आराधना-पूजा महर्षि सनकादिक एवं देवर्षि नारद ने भी की थी।
यही श्रीविग्रह श्री सनकादिको ने देवर्षि नारद जी को दान किया था। नारद जी ने यही श्रीविग्रह भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य जी को दान किया था। तब से ही परम्परानुसार यह श्रीविग्रह श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, श्रीनिम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। इसका प्रमाण हमें   श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीवर जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर शरण देवाचार्यजी महाराज द्वारा स्वरचित ’’श्रीसर्वेश्वर प्रपा स्तोत्र’’ के प्रथम लाेक में मिलता है।
’’कृष्णं सर्वेश्वरं देवमस्माकं कुलदैवतम्‌’’
अर्थत्‌ :- श्रीसर्वेश्वर प्रभु हमारे कुलदेव है अर्थात्‌ परम्परागत ठाकुर है।
वर्तमान श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीवर  जगद्गुरु श्रीराधासर्वेश्वरारण देवाचार्यजी महाराज ने भी इस बारे में लिखा है :-
श्रीसनकादिक सेव्य हैं, श्रीसर्वेश्वर देव।
परम्परागत प्राप्त हैं, ’’शरण’’ लसत प्रभु सेव।।1।।
सर्वेश्वर प्रभु अर्चना, सुरर्षि नारद प्राप्त।
सनकादिक सेवित प्रभु, ’’शरण’’ निम्बार्क आप्त।।2।।
श्रीसर्वेश्वर प्रभु श्री शालग्राम का यह श्रीविग्रह इतना सूक्ष्म है, कि इनके दर्शन करने के लिये आवर्धक लेन्स की आवयकता पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान्‌ श्री शालिग्राम का स्वरूप जितना ज्यादा सूक्ष्म होता है उसके पूजन का उतना ही महत्व अधिक होता है। पद्मपुराण में भी इसके बारे में वर्णन मिलता है :-
तत्राप्यामलकीतुल्या पूज्या सूक्ष्मैव या भवेत्‌।
यथा यथा ालासूक्ष्मा तथास्यास्तु महत्फलम्‌।।
अर्थात्‌ - आंवले के बराबर श्री शालिग्राम की मूर्ति पूजा में हो तो उसका बड़ा भार

Tuesday, 6 December 2016

मुझको छोड़ो मनमीत नही , पंकिल

मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।
याचक निराश हो लौट जाय यह सच्चे प्रभु की रीति नहीं।
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।

स्वार्थी जगत या और देव पात्रता देख अपनाते हैं।
पर आप अनोखे नाथ कुपात्रों को भी गले लगाते हैं।
आपसी पिता-माता का नात है बालू की भीत नहीं।
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।1।।

क्या विरद विसार दिया अपना दर्शन साकार नहीं दोगे?
भवसागर में डूबता मुझे क्या कर-आधार नहीं दोगे?
होशा जासी में ही दुर्लभ नर-जीवन जाये बीत नहीं-
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।2।।

ऐसे कुठाँव में फॅंसा, फिसलते निर्बल पाँव लगी काई।
घर का न घाट का श्वान, इधर पानी का कुआँ, उधर खाई।
मेरे दुर्दशा-लड़ाई क्यों लेते, करूणा से जीत नहीं-
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।3।।

कर पकड़ो परमेश्वर देखो, कितनी सह रहा तबाही मैं।
मत बूँद-बूँद के हित तरसाकर मारो मरू का राही मैं।
सब पड़ा अधूरा क्यों कर देते, पूरा मेरा गीत नहीं-
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।4।।

तेरी दयालुता है अगाध, मेरे अपराध डुबा दो तुम।
नीरस ‘पंकिल’ जीवन में निज, सुधि का मधुमास खिला दो तुम
लीला-गायन के सिवा और भायें कोई संगीत नहीं-
मुझको छोड़ो मनमीत नहीं।।5।।

Wednesday, 16 November 2016

हरिराम व्यास जु

राधे राधे
🌷🌷आज की "ब्रज रस धारा"🌷🌷
दिनांक 16/11/2016

'हरीराम व्यास'जी जिन्होंने राजा को दिव्य वृंदावन के स्वरुप का दर्शन कराया.व्यास जी ओरछा नरेश 'मधुकरशाह' के 'राजगुरु' थे. और'गौड़ संप्रदाय'के वैष्णव थे.ये संस्कृत के शास्त्रार्थी पंडित थे और सदा शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार रहतेएक बार जब ये वृंदावन आये और गोस्वामी हितहरिवंश जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा. गोसाईं जी ने नम्र भाव से यह पद कहा -यह जो एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनै सचु पायो।जहँ तहँ बिपति जार जुवती ज्यों प्रगट पिंगला गायोयह पद सुनकर व्यास जी चेत गए और हितहरिवंश जी के अनन्य भक्त हो गए.और हितहरिवंश जी के शिष्य होकर राधावल्लभी हो गए.और मन में ठान लिया कि वृंदावन छोड़कर अन्यत्र कही भी कदम तक नहीं रखेगे.वृन्दावन में जिस प्रकार'निधिवनराज'स्वामी श्रीहरिदासजी की साधना स्थली है, श्रीहित हरिवंश महाप्रभुजी की'सेवाकुंज'साधना स्थली है, उसी प्रकार बनखण्डी से लोई बाजार जाते हुए सेवाकुंज के दक्षिण भाग से लगा‘किशोरवन’रसिक संत श्रीहरिरामव्यासजी की साधनास्थली है.हरि हम कब हवै हैं ब्रजवासीय।ठाकुर नन्दकिशोर हमारे, ठकुराइन राधा सी।कब मिलि हैं वे सखी सहैली, हरिवंशी हरिदासी।।वंशीवट की शीतल छैंया, सुभग नदी यमुना सी।इतनी आस व्यास की पुजवौ, वृन्दा विपिन विलासी।।जब ओरछा नरेश मधुकर शाह इन्हें लेने आये, तो इन्होने मना कर दिया.कि हम वृंदावन छोड़कर अन्यत्र नहीं जायेगे.तब उन्होंने प्रश्न किया -गुरुदेव! ऐसी कौन-सी विशेषता है वृंदावन में? ये मै मानता हूँ कि ये धाम है, पर भजन तो कही भी रहकर किया जा सकता है ना ? आप चलिए आपके भजन में कोई व्यवधान नहीं डालेगा.तब हरिराम व्यास जी ने उत्तर दिया -श्री धाम वृंदावन कारसमय स्वरुप यहाँ प्रकट है.इसलिए मै एक कदम भी बाहर नहीं निकाल सकता.राजा बोले -गुरुदेव !यदि कृपा हो जाए तो दास को भी उस चिन्मय,रसमय दिव्य स्वरुप के दर्शन करा दीजिये.तब व्यास जी ने राजा के सिर पर हाथ रखा, और फिर नरेश की तो मानो द्रष्टि ही बदल गई, दिव्य वृंदावन के साक्षात् दर्शन होने लगे, यही नहीं नित्य बिहार करते श्यामा-श्याम के परिकर सहित दर्शन हो गए,एक पल में ही सबकुछ बदलगया. कहाँ तो गुरु जी को ले जाने के लिए आये थे, अब कह रहे है, कि मुझे राज्य से कोई काम नहीं मै अब वृंदावन सेनहीं जाऊँगा.अब तो बड़ी समस्या हो गयी,राजा ही जब वैरागी हो गया तो राज्य कैसे चलेगा,सबने गुरुदेव से प्रार्थना करि,गुरुदेव ने मधुकर शाह को आशीर्वाद देते हुए कहा - राजन! जाओ तुम जहाँ तक जाओगे तुम्हे कभी वृंदावन का वियोग नहीं होगा यहाँ से लेकर तुम्हारे राज्य तक वृंदावन का स्वरुप तुम्हारे लिए प्रकट रहेगा,सच है गुरुदेव क्या नहीं कर सकते.इस प्रकार संत ने व्रज की महिमा प्रकट की.

   🙏🏻बृज रसिक श्याम सुन्दर गोस्वामी🙏🏻

Tuesday, 15 November 2016

बिहारिन देव जु चरित्र भाग 1

💐💐निताई गौर हरि बोल💐💐

क्रमशः से आगे.....

क्रम 5⃣
            🌸ब्रज भक्तमाल 🌸
             🌿प्रथम खण्ड🌿
         🌸श्री बिहारिन देव जू🌸
        ( कालावधि 1504-1602,)
       
🌸 चरित्र 🌸

हौ तो और स्वरुप पिछानौ नही, हरिदास बिना हरि को है कहाँ को ।।

                      🌿स्वामी हरिदास जी महाराज के निकुंज गमन के पश्चात विट्ठल विपुल देव जी अपने गुरु के वियोग में केवल 7 दिन में ही उनके अनुगामी हो गए तब उस नित्य बिहार की उपासना की धुरी को बिहारिन देव जी ने संभाला। स्वामी बिहारिन देव जी ने बहुत वाणियों की रचना की उनके साहित्य को दो भागों में विभाजित किया गया ।

सिद्धांत साहित्य
रस साहित्य
                     🌿 एक बार आप यमुना स्नान के लिए गए वहां यमुना पुलिन पर दिव्य लीला के दर्शन करते हुए अपने देह सुध को भूल कर निज सखी स्वरूप में, प्रिया लाल जी को पद गा कर सुनाने लगे-

" विहरत लाल- बिहारिन  दोऊ श्री यमुना के तीरै -तीरै…....."

                       🌿इस तुक को गाते हुए ही आपको निराहार जमुना तट पर तीन दिन व्यतीत हो गए और इधर निधिवन राज में विराजमान बिहारी जी की सेवा ही नहीं हुई। ऐसी लीलाओं में निरंतर डूबे रहते थे। तब सेवा में व्यवधान जानकर बिहारी जी की सेवा अन्य को प्रदान की।

                 🌿तब बिहारी जी की सेवा भली-भांति होने लगी श्री बिहारिन देव जी ने वृंदावन रस का अनुपम वर्णन किया है।

                       🌿एक बार सुहावनी शरद ऋतु का समय था निधिवन का सौंदर्य सीमा को तोड़ रहा था।  नित्य केलि  रस के मत मधुप श्री बिहारिन देवजी नेत्र मूंदकर प्रिया प्रीतम की कुंज क्रीडा के अवलोकन में निमग्न हो रहे थे।  उसी समय अपने सखाओं के साथ खेलते हुए त्रिभुवन मोहन श्याम सुंदर वहां आ पहुंचे।  सभी स्खाओं ने स्वामी बिहारिन देव जी को इस प्रकार नयन बंद किए देखा तो उनका कोतूहल जागृत हो उठा।  श्री कृष्ण से पूछा ही बैठे -

" अरे कन्हैया !  देख तो वु कौन बाबाजी आंख मीच के बैठयौ ऐ?"

                        🌿 श्याम सुंदर ने उन्हें कोई प्रोत्साहन न  देते हुए कहा- " रहन दे, तोय का परी। "  अपनौ भजन करन दै। अब तो सारे सखा मिलकर पीछे ही पड़ गये-

" नायँ भैया ! नैक चल तो सई ।  जाते कछु बातचीत करिगे ।"

                    🌿 सखाओं के हठ के आगे भला नंदनंदन की क्या चलती ? उन्हें स्वामी बिहारिन देव जी के पास आना ही पड़ा । आकर आवाज लगायी- " ओ बाबा! नैक आँख तो खोल ।"  दो तीन आवाजों का तो कुछ पता ही नहीं चला,  जब सब ने मिलकर जोर से पुकारा तो आपका ध्यान इधर आकर्षित हुआ । पर नेत्र बंद किए ही बोले- " कौन हो?  क्या बात है भाई ?

                    🌿श्री नंदनंदन बोले - " मैं बुई हूं, जाय सब लोग, माखन चोर, चितचोर, गोपीजन वल्लभ कहै हैं। " स्वामी बिहारिन देव जी बोले - "तो तिहारे संग हमारे स्वामी जी हु है का ?" श्यामसुंदर बोले - " बु तो है नाय पर सबरे सखा मेरे संग हैं।"  स्वामी बिहारिन देव जी बोले - " तो आप जिनके चित वित् को ब्रज में नित हरण करौ तहाँई जाऔ ।  हम तो श्री हरिदासी के अंक में विराजवे वारे। जुगल के रस के अनन्य है। वाके बिना हम काहूँ को नाय देखै । इन्है ही जानै।

                           🌿श्री स्वामी बिहारिन देव जी लगभग 98 वर्ष की आयु में नित्य निकुंज - क्रीड़ा  का आनंद लेते हुए स्वामी जी महाराज के नित्य सानिध्य को प्राप्त किया।  संप्रदाय में इनको श्री जी का स्वरुप बताते हैं।  जिस प्रकार स्वामी जी ने श्यामा श्याम को लाड लगाया श्यामा जू को प्रधान मान कर । उसी प्रकार स्वामी जी को लाड लड़ाने के लिए श्रीजी स्वयं श्री बिहारिन देव के रूप में प्रकट हुई और लाड लडाया।

👉 श्री बिहारिन देव जी का चरित्र यही विश्राम लेता है 🙏आगामी अंक छः  में हम श्री कृष्णदास् कविराज् जी के चरित्र का गुणगान करेंगे

क्रमशः....

✍🏻प्रस्तुति: नेह किंकरी नीरू अरोड़ा
📚 स्रोत :    ब्रज भक्तमाल

Wednesday, 2 November 2016

नामदेव चरित्र

जन्म - संत नामदेव का जन्म 26अक्तूबर,1270 ई.को महाराष्ट्र में नरसीबामनी नामक गांव में हुआ.इनके पिता का नाम दामाशेट था और माता का नाम गोणाई था.कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान पण्ढरपुर मानते हैं.दामाशेट बाद में पण्ढरपुर आकर विट्ठल की मूर्ति के उपासक हो गए थे.इनका पैतृक व्यवसाय दर्जी का था.
बचपन - अभी नामदेव पांच वर्ष के थे.तब इनके पिता विट्ठल की मूर्ति को दूध का भोग लगाने का कार्य नामदेव को सौंप कर कहीं बाहर चले गए.बालक नामदेव को पता नहीं था कि विट्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, उसे तो भावनात्मक भोग लगवाया जाता है.नामदेव ने मूर्ति के आगे पीने को दूध रखा.मूर्ति ने दूध पीया नहीं, तो नामदेव हठ ठानकर बैठ गए कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पीएंगे, वह वहां से हटेंगे नहीं.कहते हैं हठ के आगे विवश हो विट्ठल ने दूध पी लिया.
जब मंदिर का मुह घूमकर नामदेव की ओर हो गया
एक बार संत नामदेव शिवरात्रि के अवसर पर एक मंदिर में शिव के दर्शन के लिए गये.तभी पंडितो का समाज आया, नीची जाति के लोगो को भजन करते देख उन्हें अच्छा नहीं लगा इसलिए शिव के सामने इनको कीर्तन करता देख पंडितों ने इन्हें वहाँ से हटकर मंदिर के पीछे जाकर भजन कीर्तन करने को कहा, नामदेव जी मंदिर के पीछे चले गये तथा कीर्तन करने लगे. वहाँ एक चमत्कार हो गया और मन्दिर का गर्भ गृह घूमकर नामदेव जी के सामने हो गया.
कुत्ते में किये विट्टल नाथ के दर्शन
एक समय आप भजन कर रहे थे तो एक कुत्ता आकर रोटी उठाकर ले भगा. नामदेव जी उस कुत्ते के पीछे घी का कटोरा लिए भागे और कहने लगे भगवान रुखी मत खाओ साथ में घी भी लेते जाओ. जब भगाते भागते थक गए तो रूककर रोने लगे,और जैसे ही रोये वसे ही नामदेव का भाव देखकर भगवान को कुत्ते में से प्रगट होना पडा.
भक्ति की शक्ति
नामदेव जी संत ज्ञानेश्वर और अन्य संतों के साथ भारत भ्रमण को गए. मण्डली ने सम्पूर्ण भारत के तीर्थों की यात्रा की,भ्रमण करते करते जब मण्डली मारवाड के रेगिस्तान में पहुंची. तो सभी को बहुत प्यास लगी. फिर एक कुआ मिला पर उस का पानी बहुत गहरा था. और पानी निकालने का कोई साधन भी नहीं था.
ज्ञानेश्वर जी अपनी लघिमा सिद्धि के द्वारा पक्षी बनकर पानी पीकर आ गए.संत ज्ञानेश्वर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और नामदेव जी सगुण साकार ब्रह्म को भजते थे. नामदेव जी ने वहीँ पर कीर्तन आरंभ किया और भगवान को पुकारने लगे. कुआ पानी से भरकर बहने लगा. सभी ने अपनी प्यास बुझाई. यह कुआ आज भी बीकानेर से १० मील दूर कलादजी में मौजूद है.
दीक्षा - बडा होने पर इनका विवाह राजाबाई नाम की कन्या से कर दिया गया.इनके चार पुत्र हुए तथा एक पुत्री.इनकी सेविका जनाबाई ने भी श्रेष्ठ अभंगों की रचना की.पढंरपुर से पचास कोस की दूरी पर औढियानागनाथ के शिव मंदिर में रहने वाले विसोबाखेचर को इन्होंने अपना गुरु बनाया.संत ज्ञानदेव और मुक्ताबाई के सान्निध्य में नामदेव सगुण भक्ति से निर्गुण भक्ति में प्रवृत्त हुए.
संत ज्ञानेश्वर का समाधि लेना
ज्ञानदेव से इनकी संगति इतनी प्रगाढ हुई कि ज्ञानदेव इन्हें लंबी तीर्थयात्रा पर अपने साथ ले गए और काशी,अयोध्या,मारवाड (राजस्थान) तिरूपति,रामेश्वरमआदि के दर्शन-भ्रमण किए.फिर सन् 1296 में आलंदी में ज्ञानदेव ने समाधि ले ली और तुरंत बाद ज्ञानदेव के बडे भाई तथा गुरु ने भी योग क्रिया द्वारा समाधि ले ली.इसके एक महीने बाद ज्ञानदेव के दूसरे भाई सोपानदेव और पांच महीने पश्चात मुक्तबाई भी समाधिस्थ हो गई.
नामदेव अकेले हो गए.उन्होंने शोक और विछोह में समाधि के अभंग लिखे.इस हृदय विदारक अनुभव के बाद नामदेव घूमते हुए पंजाब के भट्टीवालस्थान पर पहुंचे.फिर वहां घुमान(जिला गुरदासपुर) नामक नगर बसाया.तत्पश्चात मंदिर बना कर यहीं तप किया और विष्णुस्वामी,परिसाभागवते,जनाबाई,चोखामेला,त्रिलोचन आदि को नाम-ज्ञान की दीक्षा दी.
संत नामदेव अपनी उच्चकोटि की आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए ही विख्यात हुए.चमत्कारों के सर्वथा विरुद्ध थे.वह मानते थे कि आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है.तथा परमात्मा की बनाई हुई इस भू (भूमि तथा संसार) की सेवा करना ही सच्ची पूजा है.इसी से साधक भक्त को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है.
समाधि - 80 वर्ष की आयु तक इस संसार में गोविंद के नाम का जप करते-कराते सन् 1350ई. में नामा स्वयं भी इस भवसागर से पार चले गए.

Tuesday, 18 October 2016

भक्ति और सन्त निष्ठा , सन्त रविदास

*भक्ति और संत निष्ठां*

प्रभु को पाना है तो प्रेम की गली में से गुजरना है।और प्रेम की गली इतनी पतली है कि दो उसमें चल ही नहीं सकते हमें एक होना ही है।

यह प्रसंग एक राजा की जिन्दगी का है, उसका नाम था राजा पीपा। उसने दुनिया में जो कुछ इन्सान पाना चाहता है, वो सब कुछ पाया था, महल, हीरे-जवाहरात, नौकर-चाकर, सब उसका आदेश मानते थे।

इतना सब कुछ पाने के बावजूद अचानक एक दिन उसे लगा कि कुछ कमी है, कुछ ऐसा है जो नहीं है।अंदर एक तलब-सी जग गई प्रभु को पाने की। अब राजा कभी एक महापुरुष के पास जाएं, कभी दूसरे के पास, पर प्रभु को पाने का रास्ता मिले ही नहीं।

राजा बड़ा निराश था तब किसी ने बताया कि एक संत हैं रविदास जी महाराज! आप उनके पास जाएं।

राजा पीपा संत रविदास जी के पास पहुँचे।
वहाँ देखा कि वो एक बहुत छोटी-सी झोपड़ी में रहते थे-भयानक गरीबी, उस झोपड़ी में तो कुछ था ही नहीं।

राजा को लगा, ये तो खुद ही झोपड़ी में जी रहे हैं, यहाँ से मुझे क्या मिलेगा।

लेकिन वहाँ पहुँच ही गए थे तो अन्दर भी गए और राजा ने संत रविदास जी को प्रणाम किया।

संत रविदास जी ने पूछा, किस लिए आए हो?

राजा ने इच्छा बता दी, प्रभु को पाना चाहता हूँ।

उस समय संत रविदास महाराज एक कटोरे में चमड़ा भिगो रहे थे-मुलायम करने के लिए, तो उन्होंने कहा, ठीक है, अभी बाहर से आए हो थके होगे, प्यास लगी होगी लो तब तक यह जल पियो।

कह कर वही चमड़े वाला कटोरा राजा की ओर बढ़ा दिया।

राजा ने सोचा, ये क्या कर दिया कटोरे में पानी है, उसमें चमड़ा डला हुआ है, वो गन्दगी से भरा हुआ है, उसको कैसे पी लूँ?

फिर लगा कि अब यहाँ आ गया हूँ, सामने बैठा हूँ तो करूँ क्या?
इन संत जी का आग्रह कैसे ठुकराऊँ ?

उस समय बिजली होती नहीं थी, झोपड़ी में अन्धेरा था, सो राजा ने मुँह से लगाकर सारा पानी अपने कपडो के अन्दर उडेल दिया और पीये बगैर वहाँ से चला आया।

वापस घर आ कर उसने कपडे उतारे धोबी को बुलाया और कहा कि इसको धो दो।

धोबी ने राजा का वो कपडा अपनी लड़की को दे दिया धोने के लिए।

लड़की उसे ज्यों-ज्यों धोने लगी, उस पर प्रभु का रंग चढ़ना शुरू हो गया।

उसमें मस्ती आनी शुरू हो गई और इतनी मस्ती आनी शुरू हो गई कि आस-पास के दूसरे लोग भी उसके साथ आ कर प्रभु के भजन मे गाने-नाचने लगे।

धोबी की लड़की बड़ी मशहूर भक्तिन हो गई।

अब धीरे-धीरे खबर राजा के पास भी पहुँची। राजा उससे भी मिलने पहुँचा, बोला कि कुछ मेरी भी मदद कर दो।

धोबी की लड़की ने बताया कि जो कपडा आपने भेजा था, मैं तो उसी को साफ कर रही थी, तभी से लौ लग गई है, मेरी रूह अन्दर की ओर उड़ान कर रही है।

राजा को सारी बात याद आ गई और राजा भागा- भागा फिर संत रविदास जी महाराज के पास गया और उनके पैरों में पड़ गया।

फिर रविदास महाराज ने उसको नाम की देन दी।

जब तक इन्सान अकिंचन न बन जाए, छोटे से भी छोटा, तुच्छ से भी तुच्छ न हो जाये, तब तक नम्रता नहीं आती।
और जब तक विनम्र न हो जायें, प्रभु नहीं मिल सकते।
हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे राम
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Sunday, 16 October 2016

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

श्री सनातन जी और पारस पत्थर
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सनातन जी अपना सब कुछ दान करके महाप्रभु के सेवक बन गये थे और उनकी आज्ञा से वृन्दावन मे भक्ति का प्रचार करते थे.सनातन जी एक दिन यमुना में स्नान करने के निमित्त जा रहे थे रास्ते में एक पारस पत्थर का टुकडा़ इन्हें पडा़ मिला, इन्होने उसे वही धूलि में ढक दिया.
 
अकस्मात उसी दिन एक ब्राहाण उनके पास आकर धन की याचना करने लगा इन्होने बहुत कहा -भाई हम भिक्षुक है माँगकर खाते है,भला हमारे पास धन कहाँ है किन्तु वह कहने लगा – महाराज! मैंने धन की कामना से ही अनेको वर्षो तक शिव जी की आराधना की,उन्होंने संतुष्ट होकर रात्रि के समय स्वप्न में मुझसे कहा -हे ब्राहाण तू जिस इच्छा से मेरा पूजन कर रहा है वह इच्छा तेरी वृन्दावन में सनातन जी गोस्वामी के समीप जाने से पूरी होगी बस उन्ही के स्वपन से में आप की शरण में आया हूँ.

इस पर सनातन जी को उस पारस पत्थर की याद आई उन्होंने कहा -अच्छी बात है मेरे साथ यमुना किनारे आओ,दूर से ही इशारा करते हुए उन्होंने कहा -यहाँ कही पारस पत्थर है उस ब्राहमण ने बहुत ढूँढा,थोड़ी देर बाद उसे पारस पत्थर मिल गया उसी समय उसने एक लोहे का टुकड़े से उसे छुआकर उसकी परीक्षा की देखते ही देखते लोहा सोना बन गया ब्राहाण प्रसन्न होकर घर चल दिया.

वह आधे रास्ते तक पँहुचा की उसका विचार एकदम बदल गया  उसने सोचा जो महापुरुष घर-घर जाकर टुकडे माँगकर खाता है और संसार की इतनी बहुमूल्य समझी जाने वाली इस मणि को स्पर्श तक नहीं करता अवश्य ही उसके पास इस असाधारण पत्थर से बढकर भी कोई और वस्तु है मै तो उनसे उसी को प्राप्त करुँगा !

इस पारस को देकर तो उन्होंने मुझे बहलाया है, यह सोच कर वह लौटकर फिर इनके समीप आया और चरणों में गिरकर रो-रोकर अपनी मनोव्यथा सुनाई उसके सच्चे वैराग्य को देखकर इन्होने पारस को यमुना जी में फिकवा दिया और उसे अमूल्य हरिनाम का उपदेश किया जिससे वह कुछ काल में ही संत बन गया.

किसी ने सच ही कहा है –
“ पारस में अरु संत में, संत अधिक कर मान |
   वह लोहा सोना करै यह करै आपु समान ||”

!! जय जय श्री राधे !!