Tuesday, 4 October 2016

गौर दास बाबा

व्रज के भक्त....

श्री गौरदास बाबा जी 

नंदग्राम के पावन सरोवर के तीर पर श्री सनातन गोस्वामीपाद की भजन-कुटी में श्री गौरदास बाबा जी भजन करते थे।

वे सिद्ध पुरुष थे। नित्य प्रेम सरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुन लाते, और माला पिरोकर श्रीलाल जी को धारण कराते।

फूल-सेवा द्वारा ही उन्होंने श्री कृष्ण-कृपा लाभ की थी। कृपा-लाभ करने से चार-पांच वर्ष पूर्व ही से वे फूल-सेवा करते आ रहे थे।

आज उन्हें अभिमान हो आया -' इतने दिनों से फूल-सेवा करता आ रहा हूँ, फिर भी लाल जी कृपा नही करते।

उनका ह्रदय कठोर हैं किन्तु वृषभानु नन्दिनी के मन प्राण करुणा द्वारा ही गठित हैं। इतने दिन उनकी सेवा की होती, तो वे अवश्य ही कृपा करती। अब मैं यहाँ न रहूँगा...आज ही बरसाना जी चला जाऊँगा।

संध्या के समय कथा आदि पीठ पर लाद कर चल पड़े, बरसाना जी की ओर। जब नंदगाँव से एक मील दूर एक मैदान से होकर चल रहे थे...

बहुत से ग्वाल-बाल गोचरण करा गाँव को लौट रहे थे, एक साँवरे रंग के सुंदर बालक ने उनसे पूछा-'बाबा ! तू कहाँ जाय ?

तब बाबा ने उत्तर दिया-' लाला ! हम बरसाने को जाय हैं, और बाबा के नैन डबडबा आये।

बालक ने रुक कर कुछ व्याकुलता से बाबा की ओर निहारते हुए कहा -' बाबा ! मत जा।'

बाबा बोले - ' न लाला ! मैं छः वर्ष यहाँ रहा, मुझे कुछ न मिला। अब और यहाँ रूककर क्या करूँगा.. ??

बालक ने दोनों हाथ फैलाकर रास्ता रोकते हुए कहा -' बाबा मान जा, मत जा।'

बाबा झुँझलाकर बोले -' ऐ छोरा ! काहे उद्धम करे हैं। रास्ता छोड़ दे मेरा। मोहे जान दे।

तब बालक ने उच्च स्वर में कहा-' बाबा ! तू जायेगा, तो मेरी फूल-सेवा कौन करेगा ...??

बाबा ने आश्चर्य से पलट कर पूछा-' कौन हैं रे तू ?? तो न वहाँ बालक, न कोई सखा और न ही कोई गैया।

बाबा के प्राण रो दिये ।हा कृष्ण ! हा कृष्ण ! कह रोते-चीखते भूमि पर लोटने लगे। चेतना खो बैठे।

और फिर चेतना आने पर...हा कृष्ण ! हाय रे छलिया ! कृपा भी की, तो छल से।

यदि कुछ देर दर्शन दे देते, तो तुम्हारी कृपा का भण्डार कम हो जाता क्या ?? पर नही दीनवत्सल ! तुम्हारा नही ,यह मेरा ही दोष हैं।

इस नराधम में यह योग्यता ही कहाँ, जो तुम्हे पहचान पाता ? वह प्रेम और भक्ति ही कहाँ ? जिसके कारण तुम रुकने को बाध्य होते।

उधर पुजारी जी को आदेश हुआ -' देखो, गौरदास मेरी फूल-सेवा न छोड़े। मैं किसी और की फूल-सेवा स्वीकार नही करूँगा।

               कैसे मान लूँ की
         तू पल पल में शामिल नहीं.
               कैसे मान लूँ की
         तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं.
               कैसे मान लूँ की
            तुझे मेरी परवाह नहीं.
               कैसे मान लूँ की
              तू दूर है पास नहीं.
              देर मैने ही लगाईं
            पहचानने में मेरे ईश्वर.
             वरना तूने जो दिया
      उसका तो कोई हिसाब ही नहीं.
जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया
   वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया....

जय जय श्री राधे😭😭

पागल बाबा वृंदावन

.      (पागल बाबा वृन्दावन )

कृष्णभक्तों में खासतौर पर बिहारीजी के भक्तों में एक
कथा प्रचलित है। एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का
भक्त था। एक बार उसने किसी महाजन से कुछ रुपये
उधार लिए। हर महीने वह थोड़ा-थोड़ा करके कर्ज चुकाया।
आखिरी किस्त के पहले महाजन ने उसे अदालती नोटिस
भिजवा दिया कि उधार बकाया है और पूरी रकम व्याज
सहित वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर उसने बहुत
सफाई दी पर कोई असर नहीं हुआ। मामला कोर्ट में पहुंचा।
कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही, मैंने सारा
पैसा चुका दिया है। जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके
सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। कुछ सोचकर उसने
बिहारीजी मंदिर का पता बता दिया।
अदालत ने मंदिर का पता नोट करा दिया। अदालत की
ओर से मंदिर के पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। वह
नोटिस बिहारीजी के सामने रख दिया गया। बात आई
गई हो गई। गवाही के दिन एक बूढ़ा आदमी जज के सामने
गवाह के तौर पर पेश हुआ। उसने कहा कि पैसे देते समय मैं साथ
होता था और इस-इस तारीख को रकम वापस की गई थी।
जज ने सेठ का बही- खाता देखा तो गवाही सही
निकली। रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था। जज
ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। लेकिन उसके मन में
यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन।
उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि
बिहारीजी के सिवा कौन हो सकता है।
इस घटना ने जज को इतना विभोर कर दिया किया कि
वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़कर फकीर बन गया।
कहते है कि वही न्यायाधीश बहुत साल बाद पागल बाबा
के नाम से वृंदावन लौट कर आया।
आज भी वहां पागल बाबा का बनवाया हुआ बिहारी
जी का एक मंदिर है
जिसमें श्रीश्रीराधा-गोविन्द, श्रीश्रीनिताई-गौर
श्रीदुर्गा एवं श्रीमहादेव जी विराजमान हैं।
पागल बाबा की दिनचर्या में एक अद्भुत चीज़ शामिल
थी - उनकी भोजन पद्धति।
वो प्रतिदिन जो साधु संतो का भंडारा होता उसके
बाहर जाते वहाँ पर उनकी जूठन बटोरते फिर उसका आधा
प्रभु द्वारिकाधीश को अर्पित करते और आधा स्वयं
खाते। उनको लोग बड़ी हेय द्रष्टि से देखते थे पागल तो
आखिर पागल।
पर प्रभु तो प्रेम के भूखे है,
एक दिन सभी साधुओं ने फैसला किया आज देर से भोजन
किया जायेगा और कुछ जूठन भी नहीं छोड़ी जाएगी।
पागल बाबा भंडारे के बाहर बैठे इंतज़ार कर रहे थे की कब जूठे
पत्तल फेंके जायें और वो भोजन करें। इसी क्रम में दोपहर हो
गयी वो भूख से बिलखने लगे।
दोपहर के बाद जब बाहर पत्तल फेंके गए तो उनमें कुछ भी
जूठन नहीं थी ।उन्होंने बड़ी मुश्किल से एक एक पत्तल पोछ
कर कुछ जूठन इकट्ठी की अब शाम हो चुकी थी। वो अत्यंत
भूखे थे।
उन्होंने वो जूठन उठाई और अपने मुह में डाल ली। पर मुँह में
उसको डालते ही उनको याद आया कि अरे! आज तो
बाँकेबिहारी को अर्पित किये बिना ही भोजन, ऐसा
कत्तई नहीं होगा।
अब उनके सामने बड़ी विषम स्थिति थी वो भोजन को
अगर उगल देंगे तो अन्न का तिरस्कार और खा सकते नहीं
क्योकि प्रभु को अर्पित नहीं किया। इसी कशमकश में वो
मुख बंद कर के बैठे रहे और प्रभु का स्मरण करते रहे, वो निरंतर
रोते जा रहे थे की प्रभु इस विपत्ति से कैसे छुटकारा पाया
जाये।
पर श्रीठाकुर तो सबकी लाज रखते हैं-
रात को बाल रूप में उनके पास आये और बोले क्यों रोज़
सबका जूठा खिलाते हो और आज अपना जूठा खिलाने में
संकोच कर रहे हो।
उनकी आँखों से निरंतर अश्रु निकलते जा रहे थे। प्रभु ने
उनकी गोद में बैठ कर उनका मुख खोला और कुछ भाग
निकाल कर बड़े प्रेम से उसको खाया। अब पागल बाबा
को उनकी विपत्ति से छुटकारा मिला।
ऐसे परम भगवद्भक्त थे ~ श्रीलीलानन्द ठाकुर (पागल बाबा)।
🏓
लाडली के लाड़ में, लाडलो बिगर गयो,
इस लाड़ की लडाई में, बृज में प्रेम बिखर गयो..!!
इस प्रेम के बिखराव में, लुटे सब रसिक जन,
सब सुध बुध खोकर, मैं भी पागल है गयो..!!
🏓
!! जय श्री राधे राधे !!  
          Jdk
!! जय श्री राधे राधे !!

गुलाब सखी

( बाबा ! सारंगी बजाओ.. मैं नाचूंगी  )
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गुलाब एक एक निर्धन व्यक्ति का नाम था। बरसाने की पवित्र धरती पर उसका जन्म हुआ।
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ब्रह्मा आदि जिस रज की कामना करते हैं उसका उसे जन्म से ही स्पर्श हुआ था।
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पढ़ा लिखा कुछ नहीं था पर सांरगी अच्छी बजा लेता था। श्री राधा रानी के मंदिर के प्रांगण में जब भी पदगान हुआ करता था उसमें वह सांरगी बजाया करता था।
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यही उसकी अजीविका थी। मंदिर से जो प्रशाद और दान दक्षिणा प्राप्त होती उसी से वो अपना जीवन र्निवाह करता था।
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उसकी एक छोटी लड़की थी। जब गुलाब मंदिर में सारंगी बजाता तो लड़की नृत्य करती थी।
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उस लड़की के नृत्य में एक आकर्षण था, एक प्रकार का खिंचाव था। उसका नृत्य देखने के लिए लोग स्तंभ की भांति खड़े हो जाते।
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गुलाब अपनी बेटी से वह बहुत प्यार करता था, उसने बड़े प्रेम से उसका नाम रखा राधा।
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वह दिन आते देर न लगी जब लोग उससे कहने लगे, "गुलाब लड़की बड़ी हो गई है। अब उसका विवाह कर दे।"
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राधा केवल गुलाब की बेटी न थी वह पूरे बरसाने की बेटी थी। सभी उससे प्यार करते और उसके प्रति भरपूर स्नेह रखते।
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जब भी कोई गुलाब से उसकी शादी करवाने को कहता उसका एक ही उत्तर होता," शादी करूं कैसे? शादी के लिए तो पैसे चाहिए न ?"
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एक दिन श्री जी के मंदिर के कुछ गोस्वामियों ने कहा, " गुलाब तू पैसों की क्यों चिन्ता करता है ? उसकी व्यवस्था श्री जी करेंगी। तू लड़का तो देख? "
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जल्दी ही अच्छा लड़का मिल गया। श्री जी ने कृपा करी पूरे बरसाने ने गुलाब को उसकी बेटी के विवाह में सहायता करी, धन की कोई कमी न रही, गुलाब का भण्डार भर गया,
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राधा का विवाह बहुत धूम-धाम से हुआ। राधा प्रसन्नता पूर्वक अपनी ससुराल विदा हो गई।
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क्योंकि गुलाब अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था और उसके जीवन का वह एक मात्र सहारा थी, अतः राधा की विदाई से उसका जीवन पूरी तरहा से सूना हो गया।
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राधा के विदा होते ही गुलाब गुमसुम सा हो गया। तीन दिन और तीन रात तक श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा रहा।
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लोगो ने उसको समझाने का बहुत प्रेस किया किन्तु वह सुध-बुध खोय ऐसे ही बैठा रहा, न कुछ खाता था, ना पीता था बस हर पल राधा-राधा ही रटता रहता था।
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चौथे दिन जब वह श्री जी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा था तो सहसा उसके कानों में एक आवाज आई, " बाबा ! बाबा ! मैं आ गई। सारंगी नहीं बजाओगे मैं नाचूंगी।"
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उस समय वह सो रहा था या जाग रहा था कहना कठिन था। मुंदी हुई आंखों से वह सांरगी बजाने लगा और राधा नाचने लगी
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मगर आज उसकी पायलों में मन प्राणों को हर लेने वाला आकर्षण था। इस झंकार ने उसकी अन्तरात्मा तक को झकझोर दिया था।
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उसके तन और मन की आंखे खुल गई। उसने देखा उसकी बेटी राधा नहीं बल्कि स्वयं राधारानी हैं, जो नृत्य कर रही हैं।
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सजल और विस्फरित नेत्रों से बोला, बेटी ! बेटी ! और जैसे ही कुछ कहने की चेष्टा करते हुए स्नेह से कांपते और डगमगाते हुए वह उनकी अग्रसर ओर हुआ राधा रानी मंदिर की और भागीं। गुलाब उनके पीछे-पीछे भागा ।
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इस घटना के पश्चात गुलाब को कभी किसी ने नहीं देखा। उसके अदृश्य होने की बात एक पहेली बन कर रह गई।
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कई दिनों तक जब गुलाब का कोई पता नहीं चला तो सभी ने उसको मृत मान लिया।
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सभी लोग बहुत दुखी थे, गोसाइयों ने उसकी स्मृति में एक चबूतरे का निर्माण करवाया।
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कुछ दिनों के पश्चात मंदिर के गोस्वामी जी शयन आरती कर अपने घर लौट रहे थे। तभी झुरमुट से आवाज आई," गोसाई जी ! गोसाई जी ! "
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गोसाई जी ने पूछा, " कौन ?"
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गुलाब झुरमुट से निकलते हुए बोला, " मैं आपका गुलाब। "
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गोसाई जी बोले, "तू तो मर गया था। "
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गुलाब बोला, " मुझे श्री जी ने अपने परिकर में ले लिया है। अभी राधा रानी को सांरगी सुना कर आ रहा हूं। देखिए राधा रानी ने प्रशाद के रूप में मुझे पान की बीड़ी दी है।

गोस्वामी जी उसके हाथ में पान की बीड़ी देखकर चकित रह गए क्योंकि यह बीड़ी वही थी जो वह राधा रानी के लिए अभी-अभी भोग में रखकर आ रहे थे। "
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गोसाई जी ने पूछा,"तो तू अब रहता कहां है ?"
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उसने उस चबूतरे की तरफ इशारा किया जो वहां के गोसाइयों ने उसकी स्मृति में बनवाया था।
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तभी से वह चबूतरा “गुलाब सखी का चबूतरा” के नाम से प्रसिद्द हो गया और लोगो की श्रद्धा का केंद्र बन गया।
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राधा राधा रटते ही भाव बाधा मिट जाए
कोटि जन्म की आपदा श्रीराधे नाम से जाए
~~ जय जय श्री राधे

Thursday, 4 August 2016

मुरली तेरा मुरलीधर भाग 11

मुरली तेरा मुरलीधर भाग 11
प्रेम नारायण पंकिल

संश्लेषित जीवन मधुवन को खंड खंड मत कर मधुकर मधुप दृष्टि ही सृष्टि तुम्हारी वह मरुभूमि वही निर्झर
तुम्हें निहार रहा स्नेहिल दृग सर्व सर्वगत नट नागर
टेर रहा आनन्दतरंगा मुरली तेरा मुरलीधर।।51।।

साध न कुछ बस साध यही साधना साध्य सच्चा मधुकर
यह सच्ची चेतना उतर बन जाती है जागृति निर्झर
वह है ही बस वह ही तो है अलि यह प्रेम समाधि भली
टेर रहा अमितानुरागिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।52।।

कोटि कला कर भी निज छाया पकड़ न पायेगा मधुकर
सच्चे पद में ही मिट पातीं सब काया छाया निर्झर
फंस संकल्प विकल्पों में क्यों झेल रहा संसृति पीड़ा
टेर रहा है निर्विकल्पिका मुरली तेरा मुरलीधर।।53।।

गिरि श्रृंगों को तोड़ फोड़ कर भूमि गर्भ मंथन मधुकर
सूर्य चन्द्र तक पहुंच चीर कर नभ में मेघ पटल निर्झर
उषा निशा सब दिशाकाल में मतवाला बन ढूँढ़ उसे
टेर रहा है प्राणप्रमथिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।54।।

विषय अनल में जाने कब से दग्ध हो रहा तू मधुकर
कृष्ण प्रेम आनन्द सुधामय परम रम्य शीतल निर्झर
उसे भूल जग मरुथल में सुख चैन खोजने चले कहाँ
टेर रहा शाश्वतसुखाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।55।।

मुरली तेरा मुरलीधर भाग 10

मुरली तेरा मुरलीधर भाग 10

-- प्रेम नारायण पंकिल

जाग न जाने कब वह आकर खटका देगा पट मधुकर
सतत सजगता से ही निर्जल होता अहमिति का निर्झर
मूढ़ विस्मरण में निद्रा में मिलन यामिनी दे न बिता
टेर रहा विस्मरणविनाशा मुरली तेरा मुरलीधर।।46।।

क्या स्वाधीन कभीं रह सकता क्षुद्र भोग भोगी मधुकर
क्षणभंगुर वासना बीच बहता न प्रीति का रस निर्झर
भरा भरा भटकता बावरे रिक्त न निज को किया कभीं
टेर रहा रिक्तान्तरालया मुरली तेरा मुरलीधर।।47।।

बड़भागी हो सुन सच्चे का कितना प्यारा स्वर मधुकर
जाते जहाँ वहीं बह जाता गुनगुन गीतों का निर्झर
और मिले कुछ मिले न जग में बस अक्षय धन कृष्ण स्मरण
टेर रहा प्रभुसम्पदालया मुरली तेरा मुरलीधर।।48।।

अहोभाग्य तुमको ज्योतिर्मय करता है दिनमणि मधुकर
नहलाता मनहर रजनी में उसका राकापति निर्झर
धन्य धन्य तुमको प्रियतम का दुलराता तारा मंडल
टेर रहा है विश्वंभरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।49।।

सुमनों की मधु सुरभि धार में तुम्हें बुलाता वह मधुकर
वासंती किसलय में तेरे लिये लहरता रस निर्झर
कली कली प्रति गली गली में रहा पुकार गंधमादन
टेर रहा है सर्वमूर्तिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।50।।

Thursday, 14 July 2016

मुरली तेरा मुरलीधर , भाग 9

मुरली तेरा मुरलीधर , भाग 9
प्रेम नारायण पंकिल

सोच अरे बावरे कर्म से ही तो बना जगत मधुकर
चल उसके संग रच एकाकी एक प्रीति पंकिल निर्झर
प्राण कदंब छाँव में कोमल भाव सुमन की सेज बिछा
टेर रहा सुखसृष्टिविधाना मुरली तेरा मुरलीधर।।41।।

रख निश्शब्द स्नेह से उसके आनन पर आनन मधुकर
भर ले रिक्त हृदय की गागर उमड़ा सच्चा रस निर्झर
प्राणों से प्राणों का पंकिल चलने दे संवाद सरस
टेर रहा है संवादसर्जिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।42।।

सुमन सुमन प्रति कलिका कलिका मँडराता फिरता मधुकर
क्षुधा पिपासा मिटी न युग से भटक रहा है तू निर्झर
तू मन का मन नहीं तुम्हारा खंड खंड में फंसा चपल
टेर रहा है क्लेशनाशिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।43।।

फेरा तेरा जन्म जन्म का मिटा नहीं लम्पट मधुकर
अभीं और कितना भटकेगा इस निर्झर से उस निर्झर
बहिर्मुखी गुंजन से तेरी भग्न हुई जीवन वीणा
टेर रहा है प्राणगुंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।44।।

किया न अवलोकन अंतर्मुख मौन शान्त मानस मधुकर
शान्त चित्त में ही विलीन हो पाता अहंकार निर्झर
सुन विचार शून्यता बीच निज प्रियतम की पदचाप मधुर
टेर रहा है शांतिसागरा मुरली तेरा मुरलीधर।।45।।
क्रमशः ...

Friday, 1 July 2016

मुरली तेरा मुरलीधर 8

प्राणेश्वर के संग संग ही कुंज कुंज वन वन मधुकर
डोल डोल हरि रंग घोल अनमोल बना ले मन निर्झर
शेश सभी मूर्तियाँ त्याग सच्चे प्रियतम के पकड़ चरण
टेर रहा है सर्वशोभना मुरली तेरा मुरलीधर।।36।।

छवि सौन्दर्य सुहृदता सुख का सदन वही सच्चा मधुकर
कर्म भोग दुख स्वयं झेल लो हों न व्यथित प्रियतम निर्झर
तुम आनन्द विभोर करो नित प्रभु सुख सरि में अवगाहन
टेर रहा है प्राणपोषिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।37।।

ललित प्राणवल्लभ की कोमल गोद मोदप्रद है मधुकर
प्रियतम की मृणाल बाँहें ही सुख सौभाग्य सेज निर्झर
प्रेम अवनि वह पवन प्रेम जल प्रेम वह्नि गिरि नभ सागर
टेर रहा है प्रेमाकारा मुरली तेरा मुरलीधर।।38।।

डूब कृष्ण स्मृति रस में मानस मधुर कृष्णमय कर मधुकर
बहने दे उर कृष्ण अवनि पर कल कल कृष्ण कृष्ण निर्झर
सब उसका ही असन आभरण शयन जागरण हास रुदन
टेर रहा है सर्वातिचेतना मुरली तेरा मुरलीधर।।39।।

हृदय कुंज में परम प्रेममय निर्मित अम्बर मधुकर
उसी परिधि में विहर तरंगित सर्वशिरोमणि रस निर्झर
इस अम्बर से भी विशाल वह प्रेमाम्बर देने वाला
टेर रहा है विश्ववंदिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।40।।