Thursday, 10 August 2017

नरहरि सुनार कथा

(((((( नरहरि सुनार की करधनी ))))))

    हरिहर की कथा
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नरहरि सुनार रहते तो पंढरपुर में थे, किंतु इनका हृदय काशी के भोले बाबा ने चुरा लिया था।
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शिव की भक्ति में ये इतने मगन रहते थे कि पंढरपुर में रहकर भी विट्ठल भगवान् को न तो इन्होंने कभी देखा और न ही देखने को उत्सुक थे।
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नरहरि सुनारी का काम करते थे। इस लिए जब सोने के आभूषण बनाते, तो उस समय भी शिव, शिव, शिव, शिव का नाम सतत इनके होंठों पर रहता। इस लिए इनके बनाए आभूषणों में भी दिव्य सौंदर्य झलकने लगता था।
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पंढरपुर में ही रहता था एक साहूकार, जो कि विट्ठल भगवान् का भक्त था। उसके कोई पुत्र न था। उसने एक बार विट्ठल भगवान् से मनौती की कि यदि उसे पुत्र हुआ, तो वह विट्ठल भगवान् को सोने की करधनी (कमरबंद या कमर पट्टा) पहनाएगा।
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विट्ठल भगवान् की कृपा से उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। वह खुशी से फूला न समाया और भागा-भागा नरहरि सुनार के पास सोना लेकर पहुँचा और बोला,
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नरहरि जी ! विट्ठल भगवान् ने प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान किया है। अतः मनौती के अनुसार आज मैं विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित सोने की करधनी पहनाना चाहता हूँ।
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पंढरपुर में आपके अलावा इस प्रकार की करधनी और कोई नहीं गढ़ सकता। इस लिए आप यह सोना ले लीजिए और पांडुरंग मंदिर में चलकर विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले आइए और जल्दी से करधनी तैयार कर दीजिए।
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विट्ठल भगवान् का नाम सुनकर नरहरि जी बोले, "भैया ! मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य देवता के मंदिर में प्रवेश नहीं करता। इसलिए आप किसी दूसरे सुनार से करधनी तैयार करा लें।
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लेकिन साहूकार बोला, नरहरि जी ! आपके जैसा श्रेष्ठ सुनार तो पंढरपुर में और कोई नहीं है, इसलिए मैं करधनी तो आपसे ही बनवाऊँगा। यदि आप मंदिर नहीं जाना चाहते हैं, तो ठीक है। मैं स्वयं विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ला देता हूँ। नरहरि जी ने मजबूरी में इसे स्वीकार कर लिया।
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साहूकार विट्ठल भगवान् की कमर का नाप लेकर आ गया और नरहरि जी ने उस नाप की रत्नजड़ित सोने की करधनी बना दी।
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साहूकार आनंद पूर्वक उस करधनी को लेकर अपने आराध्य देव विट्ठल भगवान् को पहनाने मंदिर गया। जब पुजारी जी वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनाने लगे, तो वह करधनी कमर से चार अंगुल बड़ी हो गई।
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साहूकार करधनी लेकर वापिस नरहरि जी के पास लौटा और उस करधनी को छोटा करवा लिया। जब वह पुनः करधनी लेकर मंदिर पहुँचा और पुजारी ने वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनानी चाही, तो अबकी बार वह चार अंगुल छोटी निकली।
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नरहरि जी ने करधनी फिर बड़ी की, तो वह चार अंगुल बढ़ गई। फिर छोटी की, तो वह चार अंगुल कम हो गई। ऐसा चार बार हुआ। पुजारी जी व अन्य श्रद्धालुओं ने साहूकार को सलाह दी कि नरहरि जी स्वयं ही विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले लें।
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साहूकार के अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर नरहरि जी बड़ी मुश्किल से विट्ठल भगवान् के मंदिर में जाकर स्वयं नाप लेने को तैयार हुए।
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किंतु कहीं उन्हें विट्ठल भगवान् के दर्शन न हो जाएँ, यह सोचकर उन्होंने साहूकार के सामने यह शर्त रखी कि मंदिर में घुसने से पहले मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँगा और हाथों से टटोल कर ही आपके विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले सकूँगा।
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साहूकार ने नरहरि जी की यह शर्त मान ली। अनेक शिवालयों से घिरे पांडुरंग मंदिर की ओर कदम बढ़ाने से पहले नरहरि जी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। साहूकार इन्हें मंदिर के अंदर ले आया और विट्ठल भगवान् के सामने खड़ा कर दिया।
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जब नरहरिजी ने नाप लेने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए और मूर्ति को टटोलना शुरू किया, तो उन्हें लगा कि वे पाँच मुख, दस हाथ वाले, साँपों के आभूषण पहने हुए, मस्तक पर जटा और उसमें से प्रवाहित हो रही गंगा वाले शंकर भगवान् की मूर्ति का स्पर्श कर रहे हैं।
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नरहरि जी ने सोचा, 'कहीं साहूकार मुझ से ठिठोली करने के लिए विट्ठल भगवान् के मंदिर की जगह किसी शिवालय में तो नहीं ले आए हैं। यह सोचकर ये अपने आराध्य देव के दर्शन के लोभ से बच नहीं पाए और प्रसन्न होकर इन्होंने अपनी आँखों से पट्टी खोल दी।
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किंतु आँखें खोलकर देखा तो ठगे से रह गए। देखा सामने उनके आराध्य शिव भगवान् नहीं विट्ठल ही खड़े हैं। झट इन्होंने फिर से अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी और पुनः नाप लेने लगे।
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लेकिन जैसे ही इन्होंने पुनः मूर्ति के दोनों ओर अपने हाथ ले जाकर कमर की नाप लेने का प्रयास किया, तो इन्हें पुन: ऐसा आभास हुआ कि मानो ये अपने इष्टदेव बाघाम्बर धारी भगवान् शिवजी का ही आलिंगन कर रहे हों।
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जैसे ही आँखों से पट्टी खोलकर देखा, तो पुनः विट्ठल भगवान् की मुस्कराती हुई छवि दिखलाई पड़ी। हड़बड़ाते हुए इन्होंने तुरंत अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और फिर से मूर्ति की कमर का नाप लेने लगे। लेकिन आँखें बंद करने पर पुनः मूर्ति में शंकर भगवान् का आभास हुआ।
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जब ऐसा तीन बार हुआ, तो नरहरि जी असमंजस में पड़ गए। इन्हें समझ में आ गया कि शिव और विट्ठल भगवान् अलग-अलग नहीं हैं। जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल (विष्णु) हैं, वे ही शंकर हैं।
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अब तो इन्होंने झट अपनी आँखों पर बँधी अज्ञान की पट्टी उतारकर फेंकी और क्षमा माँगते हुए विट्ठल भगवान् के चरणों में गिर पड़े और सुबक-सुबककर रोते हुए कहने लगे,
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हे विश्व के जीवनदाता ! मैं आपकी शरण में आया हूँ। मैं शिवजी में और आपमें अंतर करता था। इसीलिए मुझ नराधम ने आज तक आपके दर्शन तक न किए। आज आपने मेरे मन का अज्ञान और अंधकार दूर कर दिया। कृपया अपने इस अपराधी को क्षमा कर दीजिए।
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नरहरि जी की इस सरलता पर विट्ठल भगवान् रीझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर नरहरि के इष्टदेव शिवजी को सम्मान देते हुए अपने शीश पर शिवलिंग धारण कर लिया। विट्ठल भगवान् को सिर पर शिवलिंग धारण किए देखकर नरहरि जी और भी अधिक रोमांचित हो गए और अश्रुपात करते हुए गद्गद स्वर से उनकी स्तुति करने लगे।
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अब की बार नरहरि जी ने विट्ठल भगवान् की कमर की नाप लेकर प्रेम पूर्ण हृदय से जो करधनी बनाई, वह उनकी कमर में बिल्कुल ठीक बैठी। विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित करधनी पहने देख नरहरि जी और साहूकार भाव-विभोर हो उठे।
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अब नरहरि जी विट्ठल भगवान् को अपने इष्ट देव शिव भगवान् का ही रूप मानने लगे थे, अतः ये विट्ठल-भक्तों के वारकरी मंडल में शामिल हो गए। ये विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल का भगवन्नाम संकीर्तन करते हुए मस्ती में नृत्य करते।
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आज भी अपने सिर पर शिवलिंग धारण किए पंढरपुर के विट्ठल भगवान् के दर्शन कर भक्तजनों को नरहरि सुनार की इस कथा की बरबस याद आ जाती है ।

Friday, 4 August 2017

रूप गोस्वामी पाद 1

श्रील रूप गोस्वामी पाद जी आज तिरोभाव दिवस है

1⃣श्रील रूप गोस्वामी पाद
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श्रील रूप गोस्वामी जी  श्री रूप मंजरी जी के अवतार है। इनका सेवित विग्रह श्री राधा गोविन्द देव जी है ।जो वर्तमान में जयपुर में सेवित है।

🙏🏼इनकी समाधी श्री राधा दामोदर मंदिर में है ये भक्ति के सर्बोत्तम आचार्य है।

🏕इनकी भजन कुटीर वृन्दावन में हैं और टेर क़दम नन्दगाँव में है।

📚श्रील रूप गोस्वामी जी द्वारा लिखे दिव्य ग्रन्थ-

श्रील रूप गोस्वामी के ग्रंथ तो अथाह सागर है ।
एक ग्रंथ नहीं जगत के जितने भी युगल प्रेम रस
विशुद्ध प्रेम की बात बताते है वो सब श्रील रूप जी के ग्रंथो के अंश है।

📙इनके प्रमुख ग्रंथ है
" श्री उज्जवल नीलमणि" - इसमें सखीयो मंजरीयो सहित युगल प्रेम का रहस्य है।
जैसे भाव ,स्वभाव ,यूथ, श्री युगल गुण ,यह सब इस ग्रंथ में इन्होंने वर्णित किया।
यह बडी ही उत्तम कृति है श्री रूप की।

📕" श्री भक्ति रसमृत सिंधु" - उसमें श्री कृष्ण का चौंसठ गुण, भक्ति भाव आदि बताए गए है

📒इसके अलावा ,
श्री दानकेलीचिंतामणि, दान केली कोमदी, श्री निकुंज रहस्य, श्री मंजरी स्वरूप निरूपण, श्री सत्वमाला, उपदेशमृतसिंधु, ललित माधव, विदग्ध माधव , श्री राधा कृष्ण गनोउपदेश दीपिका।

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श्रील रूप गोस्वामी के जीवन का संक्षिप्त परिचय -

🌅श्री रूप गोस्वामी जी जन्म 1489 में हुआ

📿 इनके दीक्षा गुरु श्री मान  विद्या वाचस्पति मदोदय है

🛐 श्री चैतन्य महाप्रभु जी इनकी प्रथम भेंट 1514 में रामकली ग्राम हुई तब उनकी आयु 25 बर्ष थी।

🏞प्रयाग में श्री मन चैतन्य महाप्रभु जी उनको दिव्य प्रेम भक्ति की शिक्षा दी at the age 27

⏩ श्रील रूप गोस्वामी पाद वृन्दावन आये at the age 28।

🙏🏼श्री गोविन्द देव जी विग्रह प्रकट किया गोमा टीला वृन्दावन में माघ शुक्ल पंचमी को at the age of 46 in year 1557

📕श्री भक्ति रसामृत सिंधु पुस्तक पूर्ण की  1567 at the age of 56।

🌈अप्रकट श्रावण शुक्ल द्वादसी 1564   ,27 day after disappearence of श्रील सनातन गोस्वामी जी at श्री राधा दामोदर मंदिर in वृन्दावन At the age of 75।

🏵 श्रील रूप गोस्वामी पाद 22 साल गृहस्थ में और 53 साल वृज में रहे। 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏

*रूप गोस्वामी की ‘चाटु पुष्पाञ्जलि’ के इस श्लोक से यह कितना स्पष्ट है-*

“करुणां महुरर्थयेपरं तव वृन्दावन चक्रवर्त्तिनी।

अपिकेशिरिपोर्यया भवेत्स चाटु प्रार्थनभाजनं॥*

-हे वृन्दावन चक्रवर्तिनि! ‘मैं बार-बार तुम्हारी ऐसी कृपा की प्रार्थना करता हूँ, जिससे मैं तुम्हारी प्रिय सखी बनूं। तुम जब मानिनी हो तो कृष्ण तुम से मिलने के लिए मेरी चाटुकारी करें और मैं उनका हाथ पकड़कर उन्हें तुम्हारे पास ले आऊँ।

*श्री रूप गोस्वामी पाद की  अभिलाषा*

रूप गोस्वामी ने ' *कार्पण्य पञ्जिका' स्त्रोत* में अभिलाषा व्यक्त की है कि *जब राधा-कृष्ण विरह-व्यग्र हो वृन्दावन में परस्पर अन्वेषण करते हों, उस समय वे मञ्जरी रूप से उनका मिलन करा, उनसे हार पदकादि पारितोषिक रूप में प्राप्त कर धन्य हों, वे विलास के समय उनके निकट रहकर उनकी विभिन्न प्रकार से सेवा करें, ताम्बूल सजाकर अपने हाथ से उनके मुख में अर्पित करें, अनुंग-क्रीड़ा में उनके केश विखर जाने पर उन्हें संवार दे, उनकी वेश-भूषा फिर से कर दें और उनके तिलक शून्य ललाट पर फिर से तिलक-रचना कर दें।*

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' *उत्कलिकावल्लरी'* में उन्होंने अभिलाषा व्यक्त की है कि

*वे अपने केश-पाश खोलकर, राधा के दोनों चरणों को पोंछ देने का सौभाग्य प्राप्त कर सकें।, निकुञ्ज में विलास के उपयोगी पुष्प शय्या तैयार कर सकें, विलास के समय दोनों को मधुपान करा सकें और विलास के पश्चात उनका श्रम दूर करने के लिये चामर से बीजन कर सकें*,।

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' *श्रीगान्धर्व्वासं प्रार्थनाष्टकं*' नामक स्तव में उन्होंने अभिलाषा व्यक्ति की है कि

*जब निकुञ्ज में नानाविध पुष्प रचित शय्या पर शयन करते हुए राधा-कृष्ण मधुर नर्म विलास करते हों, तो वे दोनों की चरण-सेवा करें।*

जय हो🌹🌹🌹🙏

श्री राधा चरण रेणू

¸.•*""*•.¸
Զเधे Զเधे ....... शेरु मुजंiल
                                 
( Shreeji Gau Sewa Samiti )

ललितकिशोरी और नथुनीबाबा.

ललितकिशोरी और नथुनीबाबा........

भक्तों में एक 'सखी सम्प्रदाय' प्रचलित है, इसमें अपने को भगवान की आज्ञाकारिणी सखी मानकर और भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम सखा समझकर उपासना की जाती है।

इस सम्प्रदाय का विश्वास है कि सखी भाव से उपासना किये बिना किसी को निकुंज सेवा का अधिकार नहीं प्राप्त होता।

भक्त प्रवर साह जी और नथुनीबाबा, ये दोनों 'सखी सम्प्रदाय' में सर्वमान्य भक्त हैं।

साह जी वृन्दावन में ललितनिकुंज के भीतर रहते थे और ‘ललितकिशोरी’ नाम से प्रसिद्ध थे।

नथुनीबाबा ब्राह्मण कुल भूषण थे, परम रसिक, नि:स्पृह, सदा प्रसन्न और भगवान की रूपरसमाधुरी में नित्य छके रहने वाले थे।

वृन्दावन में नथुनीबाबा सखी भाव से रहते थे,

भगवत्संगी ही इनको प्रिय थे और भगवान राधारमण ही परमाराध्य देव थे।

नथुनीबाबा सदा नथ धारण करते थे, इसी से ‘नथुनीबाबा’ के नाम से इनकी प्रसिद्धि हो गयी थी।

साह जी-नथुनीबाबा की भेंट:-

वृन्दावन में एक प्राचीन मन्दिर के कुंज में ही नथुनीबाबा का सदा निवास था।

छ: महीने बीतने पर एक बार कुंज का द्वार खुलता था,
उस समय वृन्दावन के सभी भक्त महात्मा सखी जी का दर्शन करने जाते और उनके मुखारविन्द से सुधास्वादोपम माधुर्य रस की कथा सुनकर कृतकृत्य होते थे।

यही तो सत्संग की महिमा है, जिससे भगवान की रसभरी कथा सुनने को प्राप्त होती है।

एक बार नियमित समय पर नथुनीबाबा के कुंज का द्वार खुला,
सभी संत-महात्मा सखी जी के दर्शनार्थ पधारे, भक्तों के हृदय में प्रेमप्रवाह बह चला।

साह जी भी श्रीराधारमण के प्रसाद का पेड़ा लेकर वहां पधारे और सखी जी को प्रणाम करके बैठ गये।

साह जी और नथुनीबाबा, इन दोनों भक्तों के समागम से भक्त-मण्डली बहुत ही सन्तुष्ट हुई, सभी चुप हो गये।

ये दोनों ही महात्मा रागानुराग भक्ति में सदा ही निमग्न रहते थे।

साह जी को देखकर नथुनीबाबा नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाते हुए गद्गद वाणी में बोले:- "दारी आयी हैं क्या,
जीवन सफल करने में कोई पास न रखना।"
यह सुनकर साह जी भी प्रेमप्रवाह में बहते हुए बोले:- "हां जी, आपके पास आयी हूँ,

अभिलाषा पूरी कीजियो"
कोई दिलवर की डगर बताय दे रे...😭

लोचन कंज कुटिल भृकुटी कच कानन कथा सुनाय दे रे॥
ललितकिसोरी मेरी वाकी चित की सांट मिलाय दे रे।

जाके रंग रंग्यौ सब तन मन, ताकी झलक दिखाय दे रे॥

यह गीत गाकर साह जी पुन: बोले:- "कभी ललित कुंज में पधारौ।"

बाबा बोले:- "यदि गोडा छोड़ै तो।"

तात्पर्य यह कि प्रियतम का आलिंगन सदा होता रहता है, फिर बाहर कैसे जाया जाये।

बस, इतना सुनकर साह जी गद्गद हो गये और पुन: प्रणाम करके लौट आये।

ऐसे-ऐसे महात्मा अब भी वृन्दावन में विराजते हैं, जिन पर भगवान की कृपा होती है, वे ही यह रस लूटते हैं।

जय श्री राधे ....😭😭

Sunday, 16 July 2017

लोकनाथ गोस्वामी जु

लोकनाथ गोस्वामी का जन्म अद्वैत आचार्य के शिष्य श्री पद्मनाभ भट्टाचार्य एवं सीता देवी के पुत्र के रूप में बांग्लादेश के जेस्सोर प्रान्त के तालखरी गाँव में हुआ था ।

गौरांग महाप्रभु के निकटतम भक्त शुद्ध भक्ति में लीन थें। उनमे से लोकनाथ गोस्वामी सभी गोस्वामियों में वरिष्ठ थे।

लोकनाथ गोस्वामी नाम और प्रसिद्धि के विरुद्ध थे इसलिए उन्होंने कृष्ण दास कविराज गोस्वामी को चैतन्य चरितामृत में अपना नाम डालने से मना किया था ।
वे पूरी तरह से वृन्दावन धाम से आसक्त थे ।  दिव्य राधा विनोदजी उनके ह्रदय में लीला करते थे । उनके कान श्रीमद भागवत सुनने के लिए व्याकुल रहा करते और अगर कोई व्यक्ति श्रीमद भागवत पढता तो वे उसे अपना मित्र बताते थे ।

लोकनाथ गोस्वामी गृहस्थ आश्रम त्यागकर जब श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले तो उन्होंने कहा कि मैं स्वयं भी संन्यास लेकर वृन्दावन जाने वाला हूँ । महाप्रभु से अनेक निर्देश लेकर लोकनाथ गोस्वामी भारी मन से वृन्दावन की ओर चले । उनकी यह अवस्था देखकर भूगर्भ गोस्वामी भी उनके साथ हो लिए । वृन्दावन पहुँच कर लोकनाथ गोस्वामी को महाप्रभु से विरह सताने लगा तो वे उनसे मिलने निकल पड़े । उन्हें पता चला कि महाप्रभु संन्यास लेकर पुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले हैं तो वे भी पीछे पीछे चल पड़े । जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें पता लगा कि महाप्रभु वृन्दावन की ओर गए हैं, तब लोकनाथ गोस्वामी ने वृन्दावन का रुख किया । वृन्दावन पहुँच कर पता चला कि महाप्रभु प्रयागचले गए हैं तब इन्होने भी प्रयाग की ओर प्रस्थान करने का मन बनाया । परन्तु महाप्रभु में स्वप्न में आकर उन्हें यूँ ही इधर उधर भटकने के लिए मना कर दिया और आज्ञा दी कि वे वहीँ रहें ।

एक दिन श्री कृष्ण ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें राधा – विनोद जी के  विग्रह  प्रदान किये ।
लोकनाथ गोस्वामी उसे एक कपडे की झोली में डालकर अपने साथ लेकर पुरे ब्रज में घूमा करते थे ।

लोकनाथ गोस्वामी ने नरोत्तम दास ठाकुर को शिष्य के रूप में स्वीकार किया,  जो उनके एक मात्र  शिष्य थे ।
वे  हमेशा उनकी विनम्रता और निस्वार्थ सेवा की सराहना करते थे  नरोत्तम दास ठाकुर हर रात्रि को उस भूमि की सफाई करते थे जहाँ लोकनाथ गोस्वामी मल त्याग करते थे इस तरह से वे उनकी गुप्त रूप से सेवा किया करते थे ।

लोकनाथ गोस्वामी के राधा – विनोद जी के  विग्रह की पूजा आज भी जयपुर में की जाती हैं ।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को श्रील लोकनाथ गोस्वामी भगवान की नित्य लीलाओं में प्रविष्ट हो गए ।

वृन्दावन के श्री श्री राधा गोकुलानंद मंदिर के आँगन में लोकनाथ गोस्वामी की समाधी है ।
लोकनाथ गोस्वामी नित्य वृन्दावन लीला में लीला मंजरी के रूप में राधारानी की सेवा करते हैं ।

Tuesday, 16 May 2017

भक्त नरहरि देव जु

भक्त नरहरिदेव जी

बुंदेलखंड में गूड़ों नाम का एक ग्राम था। इसी गांव’ में विष्णुदास और उत्तमा देवी नाम के दम्पती रहते थे। साधारण जीवन जीते हुए दम्पती भगवान का भजन भी करते और साधु सेवा भी करते।

विक्रम सवत् 1640 (सन् 1583) में उत्तमा देवी के गर्भ से एक दिव्य बालक ने जन्म लिया। बालक का रूप-स्वरूप अत्यत आकर्षक और मनमोहक था। जैसे-जैसे यह बालक बड़ा होता गया इसका व्यक्तित्व आकर्षक होता गया। माता-पिता ने बालक का नाम नरहरि रखा।

बाल्यावस्था से भक्ति और धर्म के प्रति नरहरि के हृदय में आस्था थी। अपने हम उम्र बालकों में नरहरि सबसे विलक्षण था। उसकी बौद्धिक क्षमता और विश्लेषण क्रिया के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान भी आश्चर्यचकित हो उठते।

जिस प्रकार सुगंध दूर-दूर जाकर भ्रमर को पुष्प का पता बताती है उसी प्रकार सत्पुरुष की ख्याति दूर तक जाती है। नरहरि के भक्तिभाव और ज्ञान से सब उसका सम्मान करते थे।

उसी समय पास के किसी गाव में एक धन धान्य से समृद्ध वैश्य कुष्ठ रोग से पीड़ित था। उसके पास सब कुछ होते हुए भी लोग उसके पास बैठने से कतराते थे।

उसका रोग लोगों में उसके प्रति घृणा का कारण बन गया था। जब किसी भी उपचार से उसे कोई लाभ न हुआ तो उसने ईश्वर का साथ पकड़ा।

”हे कृपानिधान मैंने किस जन्म में कौन अपराध किया है जिसका मुझे यह दंड मिला है।” उसने रोज प्रभु से विनती की: “मेरे पास सब कुछ है पर निरोगी काया न होने से मैं उपेक्षा का पात्र हूं। यदि मैंने कोई पूर्वजन्म में अपराध किया है तो मुझे क्षमा करें करुणा सागर।”

उसी रात उसकी सच्चे मन की प्रार्थना स्वीकार हो गई। ”तेरी सच्ची पुकार मैंने सुन ली है।” भगवान ने स्वप्न में कहा: ”पूर्वजन्म में किए पापकर्मों से तुझे यह दंड मिला था। यदि तू अब भी धर्मपथ पर चलने का वादा करे तो मैं तुझे इस रोग से मुक्ति पाने का मार्ग बता सकता हूं ।”

”भगवन्, मैं संकल्प करता हूं कि स्वयं को आपको समर्पित कर दूंगा।”

”तो ठीक है। यहां से कुछ दूरी पर गूड़ो गांव में मेरा परमभक्त नरहरि रहता है। उसके पास जा उसके चरणामृत पीने से तेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।” वैश्य ने उसी क्षण सकल्प किया कि वह अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति में बिताएगा।

भोर होते ही वह गूड़ों गांव की ओर चल दिया। लोग उसे देखकर घृणा से मुंह फेर लेते थे और मार्ग छोड़कर एक तरफ हट जाते थे।

”भाई मुझे सिद्धपुरुष नरहरि के दर्शन करने हैं।” वैश्य ने एक व्यक्ति से याचनापूर्ण स्वर में पूछा: कृपा करके मुझे उनका निवास बताओ।

”सिद्धपुरुष..! और नरहरि ! हमारे गांव में तो एक भक्त नरहरि है।” व्यक्ति ने कहा।

”मुझे उन्हीं के पास जाना है। मुझे भगवान ने स्वप्न में बताया है कि मेरा यह कुष्ठ रोग उन्हीं सिद्धपुरुष के चरणामृत-पान करने से ठीक होगा।”

वह व्यक्ति हंस पड़ा और अन्य लोगों को भी यह बात बताई। सभी वैश्य को मूर्ख कहकर हंसी का पात्र बनाने लगे।

”चल भाई कोढ़ी ! हम भी देखें कि नरहरि कब से सिद्ध पुरुष हो गया।” वैश्य को नरहरि के पास लाया गया।

नरहरि ने भी उसकी बात सुनी और उसकी आखों में सत्य का आभास किया । वैश्य ने बड़ी श्रद्धा सै नरहरि के चरण धोए और चरणामृत पिया।

यह आस्था थी या कि चमत्कार ! उसी क्षण वह निरोगी हो गया। कुष्ठ मिट गया। वहां उपस्थित सभी ग्रामवासियों ने ‘नरहरिदैव की जय’ का घोष किया।

उसी दिन से नरहरि में लोगों की श्रद्धा और आस्था बढ़ गई धीरे-धीरे नरहरि की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी।

नरहरिदेव ने नित्य नियम बना लिया कि वह भगवान की लीलाओं पर पद रचते और भाव विभोर होकर गाते। भक्ति और भजन ही उनकी दिनचर्या वन गए थे।

वृंदावन की मनमोहिनी महिमा ने उन्हें मोह लिया था। वह ब्रज चल दिए। जब यमुना के किनारे पहुंचे तो श्याम जल की लहराती जलराशि देखकर आनंदित हो उठे पाप हारिणी यमुना के तट की माटी मस्तक पर धारण की।

कैसी लुभावनी छटा थी वृदावन की ! दूर-दूर तक कृष्ण-कन्हैया की यश पताकाओं की शृंखला थी। मंदिरों पर लहराती पताकाएं कृष्णभक्ति में डूबी नाच रही लगती थीं।

अब तो नरहरि के हृदय में भगवान के दर्शनों की इच्छा और व्याकुलता थी। वृंदावन की पवित्र भूमि का रज-रज कण-कण भगवान कृष्ण की भक्ति के गीत गा रहा था।

नरहरि का मन भी प्रेम से भर उठा। वह भी गाने लगे। वे तन की सुधि-बुधि भूल गए। कृष्ण के नाम में तो ऐसा ही रस और भाव है। जिसके हृदय में कृष्ण की नाम धुन ने स्थान कर लिया वह लोक लाज बिसराकर उन्मुक्त हो जाता है।

यही तो प्रेम दीवानी मीरा के साथ हुआ। युद्धों की भूमि पर जन्मी मीराबाई ने कृष्ण-प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण दिया कि मीरा का नाम युगों-युगों तक चिरस्मरणीय बना रहेगा।

नरहरि को भी जब वृंदावन की माटी से कृष्ण नाम की धुन सुनाई पड़ी तो वह भी दीवाने हो गए और अपना हृदय उस पवित्र भूमि और कृष्ण नाम को समर्पित कर दिया।

ऐसी लगन लगी कि हर श्वास में कृष्ण ने वास कर लिया और जब कोई भक्त भगवान में लीन हो जाता तो भगवान भी अपने भक्त के दर्शन के लिए आतुर हो उठते हैं।

नरहरिदेव सब कुछ भूल कर पद गा रहे थे। कृष्ण की प्रीति ने कंठ अवरुद्ध कर दिया और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

तत्काल एक वृद्धा ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया। कुछ समय बाद उन्हें चेत हुआ। वृद्धा के अधरों पर निश्छल मुस्कान थी।

”भक्त तुम्हारी कृष्ण प्रीति सच्ची है। प्रीति को ज्ञान से सींचो और कृष्णमय हो जाओ। जाओ वृंदावन में परम विद्वान महात्मा सरसदेव जी तुम्हें तुम्हारे इष्ट से मिला देंगे। वृद्धा ने कहा। नरहरि को लगा जैसे कोई बलात उन्हें ले जा रहा था।

वह क्षण-भर में महात्मा सरसदेव के समक्ष थे। नरहरिदेव को देखकर महात्मा जी मुस्कराए। ”आ गए नरहरिदेव ! मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।”

सरसदेव जी ने कहा : ”आओ तुम्हारी प्रीति को ज्ञान के जल से सींच दूं।” नरहरि गुरु के चरणों में गिर पड़े।

तब गुरुदेव ने उन्हें राधा-कृष्ण की रास-माधुरी का ज्ञान देना आरम्भ किया। गुरु की वाणी में ज्ञान का तो शिष्य के श्रवण में प्रीति थी और पैंतीस वर्ष की आयु में ही नरहरिदेव गुरुकृपा और कृष्ण की दया से उच्चकोटि के रसोपासक संतों में गिने जाने लगे।

उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति और गुरुभक्ति ने महात्मा सरसदेव को भी आनंदित कर दिया था। अपना सम्पूर्ण जीवन प्रेम के पर्याय ब्रज के ठाकुर रासबिहारी श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करके श्री नरहरिदेव जी ने विक्रम संवत् 1741 (सन् 1684) में निकुंज लीला में वास किया।

जय श्री राधे